Tuesday, November 2, 2021

हिरण्यगर्भ सूक्त

 

हिरण्यगर्भ सूक्त हिंदी भावार्थ सहित

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्॥

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १ ॥

भावार्थ: हे देव! सूर्य आदि सभी तेजोमय पदार्थ आप में ही निहित है। आप सृष्टि के नियामक है। आप ही पृथ्वी, आकाश आदि लोकों के आधार है। हम आपकी अभ्यर्थना करते हैं।

य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः॥

यस्य छायामृतम् यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ २ ॥

भावार्थ: हे देव! आप आत्म ज्ञान,आत्मशक्ति और पुरुषार्थ चतुष्ट्य के प्रदाता है। समस्त विश्व आपकी उपासना करता है। आपका आश्रय परम सुख देने वाला है। आपसे विमुख होना मृत्यु का आमंत्रण है। आपकी कृपा अमृतत्व प्रदान करने वाला है। आप हमारी रक्षा करें।

यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक इद्राजा जगतो बभूव॥

यः ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ ३ ॥

भावार्थ: हे देव! आप अपने महान सामर्थ्य से ही समस्त चराचर जगत् के एकमात्र अधिपति और पोषक हैं। आप सम्पूर्ण ऐश्वर्य के दाता हैं। हम आपकी अभ्यर्थना करते हैं।

यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः॥

यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ ४ ॥

भावार्थ: जिसके (महिमा) महत्त्व को ये हिमालय पर्वतनदी के साथ समुद्र भी वर्णन करते हुए से लगते हैंजिसकी ये सब चारों ओर की दिशाएँ भुजाओं जैसी-फैली हुयी हैं। हम आपकी अभ्यर्थना करते हैं।

येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृळहा येन स्वः स्तभितं येन नाकः॥

यो अंतरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ५ ॥

भावार्थ : हे देव! आपने ही द्युलोक को प्रकाशित किया है। आपने ही पृथ्वी आदि लोकों को सुस्थिर किया है। आपने ही समस्त लोकों का निर्माण किया है। आप आनंद स्वरूप हैं। हम आपके इस विराट स्वरूप को प्रणाम करते हैं। 

यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने॥

यत्राधि सूर उदतो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम॥ ६ ॥

भावार्थ : आपने ही द्युलोक और पृथिवीलोक को आमने-सामने स्तम्भित (स्थिर) कर रखा है जिसके आधार पर सूर्य उदय (प्रकाशित) होता है ऐसे ईश्वर की हम अभ्यर्थना करते हैं।

आपो ह यद् बृहतीर्विश्वमायन् गर्भं दधाना जनयन्तीरग्निम्॥

ततो देवानाम् समवर्ततासुरेकः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ७ ॥

भावार्थ : जब सारा संसार जल में निमग्न था। उस समय सृष्टि के आरम्भ में परमाणु प्रवाह आग्नेय तत्त्व को अपने अन्दर धारण करता हुआ प्रकट होता हैतब समस्त देवों का प्राणभूत एक देव परमात्मा वर्त्तमान था ऐसे हिरण्यगर्भ रूप की हम अभ्यर्थना करते हैं।

यश्चिदापो महिना पर्यपश्यद् दक्षं दधाना जनयन्तीर्यज्ञम्॥

यो देवेष्वधि देवः एक आसीत कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ८ ॥

भावार्थ : हे देव! महा जलराशि में आपने अपने महत्त्व से सृष्टियज्ञ को-प्रकट करने के हेतु, बल वेग धारण करते हुए अप्तत्त्व-परमाणुओं को जो सब ओर से देखता है जानता है, जो सब देवों के ऊपर अधिष्ठाता होकर वर्त्तमान हैउस देव की हम अभ्यर्थना करते हैं।

मा नो हिंसीज्जनिताः यः पृथिव्या यो वा दिव सत्यधर्मा जजान॥

यश्चापश्चन्द्रा बृहतीर्जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ ९ ॥

भावार्थ : जिस परमात्मा ने पृथिवीलोकद्युलोकचन्द्रताराओं से भरा मन भानेवाला अन्तरिक्ष उत्पन्न किया हैहम उनकी अभ्यर्थना करते हैं।

प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव॥

यत् कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥ १० ॥

भावार्थ: हे देव! आप भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों में व्याप्त हैं। समस्त जड़-चेतन में आप ही व्याप्त हैं। आप सर्वोपरि हैं। आप ही सकल ऐश्वर्य के स्वामी हैं। हम अपनी सुख-समृद्धि के लिए आपकी उपासना करते हैं। हमारी कामना पूर्ण हो।

     ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

इति: हिरण्यगर्भः सूक्तम्॥

Sunday, July 4, 2021

चन्द्रशेखरअष्टकस्तोत्रम्

 चन्द्रशेखरअष्टकस्तोत्रम्।


चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर 

चन्द्रशेखर पाहि माम् । 

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर 

चन्द्रशेखर रक्ष माम् ॥१॥ 


रत्नसानुशरासनं रजताद्रिशृङ्गनिकेतनं 

सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् । 

क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदिवालयैरभिवन्दितं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥२॥ 


पञ्चपादपपुष्पगन्धपदांबुजद्वयशोभितं 

भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम् । 

भस्मदिग्धकलेबरं भव नाशनं भवमव्ययं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥३॥ 


मत्तवारणमुख्यचर्मकॄतोत्तरीयमनोहरं  

पङ्कजासनपद्मलोचनपूजितांघ्रिसरोरुहम् । 

देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥४॥ 


यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं 

शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेबरम् । 

क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥५॥ 


कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वर कुण्डलं वृषवाहनं 

नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् । 

अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं  

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥६॥ 


भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं 

दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् । 

भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसंघनिबर्हणं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥७॥ 


भक्तवत्सलमर्चितं निधिक्षयं हरिदंबरं 

सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम् । 

सोमवारिदभूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥८॥ 


विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं 

संहरन्तमपि प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम् । 

कीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमन्वितं 

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥९॥ 


मृत्युभीतमृकण्डुसूनुकृतस्तवं शिवसन्निधौ 

यत्र कुत्र च यः पठेन्न हि तस्य मृत्युभयं भवेत । 

पूर्णमायुररोगतामखिलार्थसंपदमादरात 

चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः ॥१०॥ 


इति श्रीचन्द्रशेखराष्टकस्तोत्रं संपूर्णम ॥

Wednesday, February 24, 2021

शिव चालीसा

 ॥ दोहा ॥ जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान । कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥ ॥ चौपाई ॥ जय गिरिजा पति दीन दयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ भाल चन्द्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नागफनी के॥ अंग गौर शिर गंग बहाये । मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥ वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ मैना मातु की हवे दुलारी । बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि को कहि जात न काऊ ॥ देवन जबहीं जाय पुकारा । तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥ किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥ तुरत षडानन आप पठायउ । लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥ आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥ किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥ वेद माहि महिमा तुम गाई । अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला । जरत सुरासुर भए विहाला ॥ कीन्ही दया तहं करी सहाई । नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥ पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ एक कमल प्रभु राखेउ जोई । कमल नयन पूजन चहं सोई ॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥ जय जय जय अनन्त अविनाशी । करत कृपा सब के घटवासी ॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥ लै त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट ते मोहि आन उबारो ॥ मात-पिता भ्राता सब होई । संकट में पूछत नहिं कोई ॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु मम संकट भारी ॥ धन निर्धन को देत सदा हीं । जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥ अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । शारद नारद शीश नवावैं ॥ नमो नमो जय नमः शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥ जो यह पाठ करे मन लाई । ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ ॠनियां जो कोई हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥ पुत्र होन कर इच्छा जोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ पण्डित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी व्रत करै हमेशा । ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥ धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ जन्म जन्म के पाप नसावे । अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी । जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥ ॥ दोहा ॥ नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा । तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥ मगसिर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान । स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥


Saturday, February 13, 2021

अत्रि मुनि कृत राम स्तुति

 अत्रि स्तुति(संस्कृत)

नमामि भक्त वत्सलं, कृपालु शील कोमलं। भजामि ते पदांबुजं, अकामिनां स्वधामदं॥१॥


निकाम श्याम सुंदरं, भवांबुनाथ मंदरं। प्रफुल्ल कंज लोचनं, मदादि दोष मोचनं॥२॥


प्रलंब बाहु विक्रमं, प्रभोऽप्रमेय वैभवं। निषंग चाप सायकं, धरं त्रिलोक नायकं॥३॥


दिनेश वंश मंडनं, महेश चाप खंडनं॥ मुनींद्र संत रंजनं, सुरारि वृंद भंजनं॥४॥


मनोज वैरि वंदितं, अजादि देव सेवितं। विशुद्ध बोध विग्रहं, समस्त दूषणापहं॥५॥


नमामि इंदिरा पतिं, सुखाकरं सतां गतिं। भजे सशक्ति सानुजं, शची पति प्रियानुजं॥६॥


त्वदंघ्रि मूल ये नराः, भजंति हीन मत्सराः। पतंति नो भवार्णवे, वितर्क वीचि संकुले॥७॥


विविक्त वासिनः सदा, भजंति मुक्तये मुदा। निरस्य इंद्रियादिकं, प्रयांति ते गतिं स्वकं॥८॥


तमेकमद्भुतं प्रभुं, निरीहमीश्वरं विभुं। जगद्गुरुं च शाश्वतं, तुरीयमेव केवलं॥९॥


भजामि भाव वल्लभं, कुयोगिनां सुदुर्लभं। स्वभक्त कल्प पादपं, समं सुसेव्यमन्वहं॥१०॥


अनूप रूप भूपतिं, नतोऽहमुर्विजा पतिं। प्रसीद मे नमामि ते, पदाब्ज भक्ति देहि मे॥११॥


पठंति ये स्तवं इदं, नरादरेण ते पदं। व्रजंति नात्र संशयं, त्वदीय भक्ति संयुताः॥ १२॥

Wednesday, January 6, 2021

नवग्रह कवच

 नवग्रह कवच

 शिरो मे पातु मार्तण्ड: कपालं रोहिणीपति:।

मुखमङ्गारक: पातु कण्ठं च शशिनन्दन:।।

बुद्धिं जीव: सदा पातु हृदयं भृगुनंदन:।

जठरं च शनि: पातु जिह्वां मे दितिनंदन:।।

पादौ केतु: सदा पातु वारा: सर्वाङ्गमेव च।

तिथयोऽष्टौ दिश: पान्तु नक्षत्राणि वपु: सदा।।

अंसौ राशि: सदा पातु योगश्च स्थैर्यमेव च।

सुचिरायु: सुखी पुत्री युद्धे च विजयी भवेत्।।

रोगात्प्रमुच्यते रोगी बन्धो मुच्येत बन्धनात्।

श्रियं च लभते नित्यं रिष्टिस्तस्य न जायते।।

य: करे धारयेन्नित्यं तस्य रिष्टिर्न जायते।।

पठनात् कवचस्यास्य सर्वपापात् प्रमुच्यते।

मृतवत्सा च या नारी काकवन्ध्या च या भवेत्।

जीववत्सा पुत्रवती भवत्येव न संशय:।।

एतां रक्षां पठेद् यस्तु अङ्गं स्पृष्ट्वापि वा पठेत्।।

Thursday, October 29, 2020

श्री उमा महेश्वर स्तोत्रं

 श्री उमा महेश्वर स्तोत्रं – Sri Uma Maheshwara Stotram

 

नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां

परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् ।

नगॆन्द्रकन्यावृषकॆतनाभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 1 ॥

नमः शिवाभ्यां सरसॊत्सवाभ्यां

नमस्कृताभीष्टवरप्रदाभ्याम् ।

नारायणॆनार्चितपादुकाभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 2 ॥

नमः शिवाभ्यां वृषवाहनाभ्यां

विरिञ्चिविष्ण्विन्द्रसुपूजिताभ्याम् ।

विभूतिपाटीरविलॆपनाभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 3 ॥

नमः शिवाभ्यां जगदीश्वराभ्यां

जगत्पतिभ्यां जयविग्रहाभ्याम् ।

जम्भारिमुख्यैरभिवन्दिताभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 4 ॥

नमः शिवाभ्यां परमौषधाभ्यां

पञ्चाक्षरीपञ्जररञ्जिताभ्याम् ।

प्रपञ्चसृष्टिस्थितिसंहृताभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 5 ॥

नमः शिवाभ्यामतिसुन्दराभ्यां

अत्यन्तमासक्तहृदम्बुजाभ्याम् ।

अशॆषलॊकैकहितङ्कराभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 6 ॥

नमः शिवाभ्यां कलिनाशनाभ्यां

कङ्कालकल्याणवपुर्धराभ्याम् ।

कैलासशैलस्थितदॆवताभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 7 ॥

नमः शिवाभ्यामशुभापहाभ्यां

अशॆषलॊकैकविशॆषिताभ्याम् ।

अकुण्ठिताभ्यां स्मृतिसम्भृताभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 8 ॥

नमः शिवाभ्यां रथवाहनाभ्यां

रवीन्दुवैश्वानरलॊचनाभ्याम् ।

राकाशशाङ्काभमुखाम्बुजाभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 9 ॥

नमः शिवाभ्यां जटिलन्धराभ्यां

जरामृतिभ्यां च विवर्जिताभ्याम् ।

जनार्दनाब्जॊद्भवपूजिताभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 10 ॥

नमः शिवाभ्यां विषमॆक्षणाभ्यां

बिल्वच्छदामल्लिकदामभृद्भ्याम् ।

शॊभावतीशान्तवतीश्वराभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 11 ॥

नमः शिवाभ्यां पशुपालकाभ्यां

जगत्रयीरक्षणबद्धहृद्भ्याम् ।

समस्तदॆवासुरपूजिताभ्यां

नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 12 ॥

स्तॊत्रं त्रिसन्ध्यं शिवपार्वतीभ्यां

भक्त्या पठॆद्द्वादशकं नरॊ यः ।

स सर्वसौभाग्यफलानि

भुङ्क्तॆ शतायुरान्तॆ शिवलॊकमॆति ॥ 13 ॥

Saturday, October 17, 2020

 ॥अथ श्री देव्याः कवचम्॥


ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, 

चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, 

श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।


ॐ नमश्‍चण्डिकायै॥


मार्कण्डेय उवाच


ॐ यद्‌गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।

यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥


ब्रह्मोवाच


अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।

देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥


प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३॥


पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥४॥


नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥


अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।

विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥


न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।

नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥


यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।

ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥


प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।

ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥


माहेश्‍वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।

लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥


श्‍वेतरुपधरा देवी ईश्‍वरी वृषवाहना।

ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥


इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।

नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥


दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।

शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥१३॥


खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।

कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥१४॥


दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।

धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥१५॥


नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।

महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥


त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।

प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥


दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।

प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥


उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।

ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥१९॥


एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।

जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥


अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।

शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥


मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।

त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥


शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।

कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥


नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।

अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥


दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।

घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥२५॥


कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।

ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥


नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।

स्कन्धयोः खङ्‍गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥२७॥


हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।

नखाञ्छूलेश्‍वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्‍वरी॥२८॥


स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।

हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥


नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्‍वरी तथा।

पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०॥


कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।

जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१॥


गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।

पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥


नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्‍चैवोर्ध्वकेशिनी।

रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्‍वरी तथा॥३३॥


रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।

अन्त्राणि कालरात्रिश्‍च पित्तं च मुकुटेश्‍वरी॥३४॥


पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।

ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥


शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्‍वरी तथा।

अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥


प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।

वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥


रसे रुपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।

सत्त्वं रजस्तमश्‍चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥


आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।

यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥


गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।

पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥


पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।

राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥


रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।

तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥


पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।

कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥


तत्र तत्रार्थलाभश्‍च विजयः सार्वकामिकः।

यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्‍चितम्।

परमैश्‍वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥४४॥


निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥४५॥


इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।

यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥


दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।

जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः। ४७॥


नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥४८॥


अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।

भूचराः खेचराश्‍चैव जलजाश्‍चोपदेशिकाः॥४९॥


सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।

अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्‍च महाबलाः॥५०॥


ग्रहभूतपिशाचाश्‍च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।

ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१॥


नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।

मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥५२॥


यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।

जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥


यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।

तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥


देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥


लभते परमं रुपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥


इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्।

मङ्गलाष्टकम्

  ।। अथ मंगलाष्टक मंत्र ।। ॐ  श्रीमत्पङ्कजविष्टरो हरिहरौ वायुर्महेन्द्रोऽनलः चन्द्रो भास्करवित्तपालवरुणाः प्रेताधिपादिग्रहाः। प्रद्युम्नो नल...