Friday, September 18, 2020

 *आशैव राक्षसी पुंसाम्*

*आशैव विषमञ्जरी।*

*आशैव जीर्णमदिरा*

*नैराश्यं परमं सुखम्॥*   


अर्थात - प्राणी के लिए आशा ही राक्षसी, विषलता और जीर्ण मदिरा के समान है, अतः अपने जीवन में आशारहित होकर उद्योग करना चाहिए इसी में परम सुख है।


*🙏💐🌻मङ्गल🌻💐🙏*

Sunday, September 13, 2020

हिंदी दिवस पर कविता

 करो अपनी भाषा पर प्यार ।

जिसके बिना मूक रहते तुम, रुकते सब व्यवहार ।।


जिसमें पुत्र पिता कहता है, पतनी प्राणाधार,

और प्रकट करते हो जिसमें तुम निज निखिल विचार ।

बढ़ायो बस उसका विस्तार ।

करो अपनी भाषा पर प्यार ।।


भाषा विना व्यर्थ ही जाता ईश्वरीय भी ज्ञान,

सब दानों से बहुत बड़ा है ईश्वर का यह दान ।

असंख्यक हैं इसके उपकार ।

करो अपनी भाषा पर प्यार ।।


यही पूर्वजों का देती है तुमको ज्ञान-प्रसाद,

और तुमहारा भी भविष्य को देगी शुभ संवाद ।

बनाओ इसे गले का हार ।

करो अपनी भाषा पर प्यार ।।


-मैथिली शरण गुप्त

एक डोर में सबको जो है बाँधती

वह हिंदी है,

हर भाषा को सगी बहन जो मानती

वह हिंदी है।

भरी-पूरी हों सभी बोलियां

यही कामना हिंदी है,

गहरी हो पहचान आपसी

यही साधना हिंदी है,

सौत विदेशी रहे न रानी

यही भावना हिंदी है।

तत्सम, तद्भव, देश विदेशी

सब रंगों को अपनाती,

जैसे आप बोलना चाहें

वही मधुर, वह मन भाती,

नए अर्थ के रूप धारती

हर प्रदेश की माटी पर,

‘खाली-पीली-बोम-मारती’

बंबई की चौपाटी पर,

चौरंगी से चली नवेली

प्रीति-पियासी हिंदी है,

बहुत-बहुत तुम हमको लगती

‘भालो-बाशी’, हिंदी है।

उच्च वर्ग की प्रिय अंग्रेज़ी

हिंदी जन की बोली है,

वर्ग-भेद को ख़त्म करेगी

हिंदी वह हमजोली है,

सागर में मिलती धाराएँ

हिंदी सबकी संगम है,

शब्द, नाद, लिपि से भी आगे

एक भरोसा अनुपम है,

गंगा कावेरी की धारा

साथ मिलाती हिंदी है,

पूरब-पश्चिम/ कमल-पंखुरी

सेतु बनाती हिंदी है।


गिरिजा कुमार माथुर


हिंदी हमारी आन है हिंदी हमारी शान है

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।


हिंदी हमारी वर्तनी हिंदी हमारा व्याकरण

हिंदी हमारी संस्कृति हिंदी हमारा आचरण

हिंदी हमारी वेदना हिंदी हमारा गान है।

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।


हिंदी हमारी आत्मा है भावना का साज़ है

हिंदी हमारे देश की हर तोतली आवाज़ है

हिंदी हमारी अस्मिता हिंदी हमारा मान है।

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।


हिंदी निराला, प्रेमचंद की लेखनी का गान है

हिंदी में बच्चन, पंत, दिनकर का मधुर संगीत है

हिंदी में तुलसी, सूर, मीरा जायसी की तान है।

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।


जब तक गगन में चांद, सूरज की लगी बिंदी रहे

तब तक वतन की राष्ट्रभाषा ये अमर हिंदी रहे

हिंदी हमारा शब्द, स्वर व्यंजन अमिट पहचान है।

हिंदी हमारी चेतना वाणी का शुभ वरदान है।


– सुनील जोगी


Thursday, September 10, 2020

गायत्री मंत्र : अर्थ सहित व्याख्या

 गायत्री मंत्र : अर्थ सहित व्याख्या

ॐ भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

ॐ : परब्रह्मा का अभिवाच्य शब्द

भूः :  भूलोक

भुवः : अंतरिक्ष लोक

स्वः : स्वर्गलोक

तत् : वह परमात्मा अथवा ब्रह्म

सवितुः : ईश्वर अथवा सृष्टि कर्ता( सूर्य)

वरेण्यम : पूजनीय

भर्गः:  अज्ञान तथा पाप निवारक

देवस्य : ज्ञान स्वरुप भगवान का

धीमहि : हम ध्यान करते है

धियो :  बुद्धि प्रज्ञा

योः :  जो

नः : हमें

प्रचोदयात् : प्रकाशित करें। 

 

अर्थ: : हम ईश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं, जिसने इस संसार को उत्पन्न किया है, जो पूजनीय है, जो ज्ञान का भंडार है, जो पापों तथा अज्ञान की दूर करने वाला हैं- वह हमें प्रकाश दिखाए और हमें सत्य पथ पर ले जाए।

Thursday, September 3, 2020

पितृ-सूक्त

 पितृ-सूक्त

उदीरतामवर उत् परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ।

असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥ १ ॥

इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।

ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ॥ २ ॥

आहंपितृन् त्सुविदत्रॉं अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः ।

बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥ ३ ॥

बर्हिषदः पितर ऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् ।

त आ गतावसा शंतमेनाऽथा नः शं योरऽपो दधात ॥ ४ ॥

उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु ।

त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ ५ ॥

आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्र्वे ।

मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम ॥ ६ ॥

आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय ।

पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात ॥ ७ ॥     

ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः ।

तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥ ८ ॥

ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः ।

आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ् सत्यैः कव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥ ९ ॥

ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः ।

आग्ने याहि सहस्त्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥ १० ॥ 

अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः ।

अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन ॥ ११ ॥

त्वमग्न ईळतो जातवेदो ऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी ।

प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥ १२ ॥

ये चेह पितरो ये च नेह यॉंश्च विद्म यॉं उ च न प्रविद्म ।

त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥ १३ ॥

ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते ।

तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥ १४ ॥

Sunday, August 23, 2020

शिवाष्टकम्

 प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथ नाथं सदानन्द भाजाम् ।

भवद्भव्य भूतॆश्वरं भूतनाथं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


गलॆ रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकाल कालं गणॆशादि पालम् ।

जटाजूट गङ्गॊत्तरङ्गै र्विशालं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महा मण्डलं भस्म भूषाधरं तम् ।

अनादिं ह्यपारं महा मॊहमारं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


वटाधॊ निवासं महाट्टाट्टहासं महापाप नाशं सदा सुप्रकाशम् ।

गिरीशं गणॆशं सुरॆशं महॆशं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ ॥ 4 ॥


गिरीन्द्रात्मजा सङ्गृहीतार्धदॆहं गिरौ संस्थितं सर्वदापन्न गॆहम् ।

परब्रह्म ब्रह्मादिभिर्-वन्द्यमानं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भॊज नम्राय कामं ददानम् ।

बलीवर्धमानं सुराणां प्रधानं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


शरच्चन्द्र गात्रं गणानन्दपात्रं त्रिनॆत्रं पवित्रं धनॆशस्य मित्रम् ।

अपर्णा कलत्रं सदा सच्चरित्रं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वॆदसारं सदा निर्विकारं।

श्मशानॆ वसन्तं मनॊजं दहन्तं, शिवं शङ्करं शम्भु मीशानमीडॆ


स्वयं यः प्रभातॆ नरश्शूल पाणॆ पठॆत् स्तॊत्ररत्नं त्विहप्राप्यरत्नम् ।

सुपुत्रं सुधान्यं सुमित्रं कलत्रं विचित्रैस्समाराध्य मॊक्षं प्रयाति ॥

श्रीगणेशपञ्चरत्नम्

 श्रीगणेशपञ्चरत्नम्

मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं

कलाधरावतंसकं विलासलोकरक्षकम्।

अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं

नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥1॥


नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं

नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम्।

सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं

महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम्॥2॥


समस्तलोकशङ्करं निरस्तदैत्यकुंजरं

दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम्।

कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं

मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम्॥3॥


अकिंचनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्तिभाजनं

पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम्।

प्रपंचनाशभीषणं धनंजयादिभूषणं

कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम्॥4॥


नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजं

अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम्।

हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां

तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि सन्ततम्॥5॥

Friday, August 21, 2020

श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्

 


॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥


नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,

भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।

नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,

तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥


मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,

नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।

मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,

तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥


शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,

सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।

श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,

तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥


वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,

मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।

चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,

तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥


यक्षस्वरूपाय जटाधराय,

पिनाकहस्ताय सनातनाय ।

दिव्याय देवाय दिगम्बराय,

तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥


पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥


मङ्गलाष्टकम्

  ।। अथ मंगलाष्टक मंत्र ।। ॐ  श्रीमत्पङ्कजविष्टरो हरिहरौ वायुर्महेन्द्रोऽनलः चन्द्रो भास्करवित्तपालवरुणाः प्रेताधिपादिग्रहाः। प्रद्युम्नो नल...